झारखंड झारखंड नौकरी सीरीज़ एक्सप्लेनर ब्रेकिंग

JPSC-JSSC में रिफॉर्म नहीं चाहती सरकार? आंदोलन खत्म होते ही भूल गई वादा; सीएम हेमंत कब लेंगे एक्शन?

आंदोलन खत्म पर हेमंत सरकार का वादा अधूरा!
आंदोलन खत्म पर हेमंत सरकार का वादा अधूरा!
झारखंड के JPSC-JSSC छात्र आंदोलन के बाद सरकार के वादों का क्या हुआ? 19 अगस्त 2026। रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में 26 दिनों से चल रहा छात्रों का आंदोलन स्थगित हो गया। सरकार ने कई परीक्षाएं रद्द करने का फैसला किया था। जांच का भरोसा दिया था। परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए समिति बनाने और भविष्य की भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की बात कही थी। इसके बाद छात्रों ने सरकार को 60 दिन का समय दिया। यानी सरकार के पास लगभग दो महीने थे, अपनी घोषणाओं को जमीन पर उतारने के लिए। लेकिन इन 60 दिनों में कहानी ने कई मोड़ लिए। आंदोलन खत्म होने के अगले ही दिन हाई कोर्ट ने सरकार के कुछ फैसलों पर रोक लगा दी। छात्र संगठनों की रणनीतियां अलग हुईं। CID की जांच आगे बढ़ी। गिरफ्तारियां हुईं। चार्जशीट दाखिल हुई। लेकिन दूसरी तरफ जिस परीक्षा सुधार समिति को दो महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी, उसके गठन पर ही सवाल उठने लगे। 18 अक्टूबर को छात्रों की दी हुई समयसीमा पूरी हो गई। नवंबर की शुरुआत में सामने आया कि समिति अब तक गठित नहीं हुई थी। तो सवाल है, इन तीन महीनों में आखिर हुआ क्या? सरकार ने अपने कितने वादे पूरे किए? कितने अधूरे हैं? और जिस आंदोलन को 60 दिन के भरोसे पर स्थगित किया गया था, उसका अब क्या होगा?
आइए, 19 अगस्त से 5 नवंबर तक की पूरी कहानी समझते हैं।


आंदोलन स्थगित हुआ, लेकिन अगले दिन कहानी बदल गई  


19 अगस्त को छात्रों ने आंदोलन स्थगित किया था। लेकिन अगले ही दिन, 20 अगस्त को झारखंड हाई कोर्ट से एक ऐसा आदेश आया जिसने सरकार के फैसलों को कानूनी चुनौती के सामने खड़ा कर दिया। सरकार ने 18 अगस्त को 11वीं से 13वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ी नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला किया था। लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी। इसी तरह फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्तियों के मामले में भी अदालत ने राहत दी। अदालत का मूल सवाल था कि जब जांच अभी चल रही है, तब बिना संबंधित अभ्यर्थियों को पर्याप्त अवसर दिए उनकी नियुक्तियां कैसे समाप्त की जा सकती हैं? इसका असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ा जिन्होंने परीक्षा पास करके नौकरी हासिल कर ली थी। अब यहां दो पक्ष सामने थे। 

एक तरफ वे छात्र थे जो चाहते थे कि कथित गड़बड़ियों से प्रभावित परीक्षाएं रद्द हों। दूसरी तरफ वे अभ्यर्थी थे जो कह रहे थे कि अगर कुछ लोगों ने गलत तरीके से नौकरी हासिल की है तो कार्रवाई उन्हीं पर होनी चाहिए। सभी चयनित अभ्यर्थियों को एक साथ दोषी नहीं माना जा सकता। अदालत ने तत्कालीन नियुक्तियों को लेकर अंतरिम संरक्षण दिया। इसका मतलब यह नहीं था कि परीक्षा को क्लीन चिट मिल गई। न ही इसका मतलब था कि सरकार का कैन्सिलेशन  हमेशा के लिए समाप्त हो गया। यह केवल अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक की स्थिति थी। इस तरह आंदोलन स्थगित होने के अगले ही दिन यह स्पष्ट हो गया कि सरकार के फैसलों को लागू करना इतना आसान नहीं होगा।

आंदोलन के बाद छात्रों ने दूसरा रास्ता क्यों चुना? 


सरकार और छात्रों के बीच हुए समझौते के बाद आंदोलन के स्वरूप में भी बदलाव आया। 24 अगस्त को छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने रामगढ़ जिले के नेमरा गांव से भर्ती व्यवस्था सुधार यात्रा शुरू की। इस अभियान का नारा था: 24 जिला, 24 संकल्प, एक आवाज। इसका उद्देश्य था कि भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग केवल रांची तक सीमित न रहे, बल्कि राज्य के सभी जिलों के युवाओं तक पहुंचे। यात्रा में अभ्यर्थियों की समस्याएं, भर्ती प्रक्रिया की खामियां और JPSC-JSSC में सुधार की मांग को सामने लाने की बात कही गई। 

दूसरी तरफ JPSC-JSSC Reform Manch ने अपनी अलग गतिविधियां जारी रखीं। 5 सितंबर को मंच की ओर से मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा गया। इस ज्ञापन में आंदोलन के दौरान छात्रों पर दर्ज FIR वापस लेने, प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई की जांच कराने और 2014 से अब तक की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की CBI जांच कराने की मांग की गई। इसका मतलब साफ था। 19 अगस्त को आंदोलन का धरना भले समाप्त हो गया था, लेकिन छात्रों की सारी मांगें समाप्त नहीं हुई थीं। आंदोलन का एक हिस्सा अब राज्यव्यापी जनसंपर्क और भर्ती सुधार अभियान में बदल रहा था।


 सरकार ने अपने स्तर पर क्या-क्या किया?


अब आते हैं सरकार की कार्रवाई पर। 18 अगस्त के कार्मिक विभाग के आदेश में कुल 45 भर्ती प्रक्रियाओं को तीन अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया था। पहली श्रेणी में 22 भर्ती परीक्षाओं या प्रक्रियाओं को रद्द करने का निर्णय था। दूसरी श्रेणी में छह परीक्षाओं को जांच पूरी होने तक स्थगित किया गया। और तीसरी श्रेणी में 2010 से 2022 के बीच विज्ञापित 17 पुरानी परीक्षाओं को CID जांच के दायरे में लाया गया। इन फैसलों में JPSC की सिविल सेवा परीक्षाओं, JSSC-CGL, CDPO, फूड सेफ्टी ऑफिसर, ड्रग इंस्पेक्टर, वन विभाग और अन्य नियुक्तियों से जुड़ी प्रक्रियाएं शामिल थीं।
अब सवाल है कि इन फैसलों के साथ सरकार ने भविष्य के लिए क्या व्यवस्था बनाने का वादा किया?
 पहला, JPSC और JSSC में आंतरिक Vigilance Cell बनाने का निर्णय।

दूसरा, कथित भर्ती अनियमितताओं के मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए हाई कोर्ट से फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने का अनुरोध।
तीसरा, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार के लिए वरिष्ठ IAS अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति बनाने की घोषणा।
और चौथा, 17 पुरानी परीक्षाओं की CID जांच।

इनमें से कुछ फैसलों पर प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हुई और CID की जांच आगे बढ़ी। लेकिन घोषणा और क्रियान्वयन के बीच अंतर को समझना जरूरी है। मसलन, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का फैसला सरकार अकेले नहीं कर सकती थी। उसे हाई कोर्ट से अनुरोध करना था। इसी तरह Vigilance Cell बनाने की घोषणा और उसके वास्तव में काम शुरू करने के बीच भी अंतर है. यानी सरकार ने बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फैसले लिए, लेकिन अब असली परीक्षा इन फैसलों को लागू करने की थी।

अगस्त से सितंबर, अदालत में क्या हुआ?

 सरकारी फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर झारखंड हाई कोर्ट में सुनवाई जारी रही। 15 सितंबर को अदालत ने सरकार से CID जांच की प्रगति और कैन्सिलेशन  के आधारों पर जवाब मांगा। सरकार ने जांच से संबंधित रिपोर्ट अदालत में सीलबंद लिफाफे में देने की बात कही। 18 सितंबर को सरकार ने अपना जवाब दाखिल किया। इसी दौरान अदालत ने जांच से संबंधित शिकायतों की निगरानी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश गौतम कुमार चौधरी को नियुक्त किया। सेवानिवृत्त IPS अधिकारी आर.के. मलिक को नोडल अधिकारी बनाया गया। यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था। क्योंकि अब केवल जांच एजेंसी की कार्रवाई ही नहीं, बल्कि जांच के दौरान शिकायतों और अभ्यर्थियों की आपत्तियों की निगरानी का भी प्रबंध किया गया। अक्टूबर में सुनवाई आगे बढ़ी। 7 और 8 अक्टूबर को JSSC-CGL रद्द करने के सरकारी फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बहस हुई। 8 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने JSSC-CGL कैन्सिलेशन  को चुनौती देने वाले मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। लेकिन JPSC से जुड़े मामलों की सुनवाई आगे जारी रहनी थी। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझिए। 
फैसला सुरक्षित रखने का मतलब यह नहीं है कि सरकार का कैन्सिलेशन  सही या गलत घोषित हो गया। इसका अर्थ है कि अदालत ने उस मामले में अपना निर्णय बाद के लिए सुरक्षित रखा। इसलिए 5 नवंबर तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर JSSC-CGL मामले में अंतिम फैसले की स्थिति अलग से सत्यापित किए बिना कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। इस पूरे कानूनी विवाद में एक तरफ सरकार का तर्क है कि कथित अनियमितताएं इतनी व्यापक थीं कि ईमानदार और गलत तरीके से चयनित अभ्यर्थियों में अंतर करना मुश्किल हो गया था। दूसरी तरफ नियुक्त अभ्यर्थियों का कहना है कि बिना व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय किए सभी की नौकरी समाप्त करना उचित नहीं है। और इसी कानूनी पेच के कारण अगस्त में हुई घोषणाओं का अंतिम परिणाम अब भी अदालत की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।


30 सितंबर और 1 अक्टूबर, छात्रों ने फिर अल्टीमेटम क्यों दिया? 


अब आते हैं 60 दिन की समयसीमा के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर। 30 सितंबर को JPSC-JSSC Reform Manch ने रांची में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। मंच की सदस्य अर्चना कुमारी ने आरोप लगाया कि सरकार की ओर से परीक्षा सुधार समिति बनाने की घोषणा के बावजूद कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दे रही है। छात्रों का कहना था कि समिति में अभ्यर्थियों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने भर्ती कैलेंडर, रिक्त पदों की जानकारी और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग दोहराई। इसके बाद 1 अक्टूबर को मंच ने सरकार को 18 अक्टूबर तक का नया अल्टीमेटम दिया। कहा गया कि यदि निर्धारित समय तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो राज्यभर के छात्रों की महापंचायत बुलाई जाएगी और आगे की रणनीति तय की जाएगी। मंच ने पुलिस और उत्पाद सिपाही भर्ती से जुड़े कुछ अलग मुद्दे भी उठाए। 

अब ध्यान दीजिए। 19 अगस्त को आंदोलन स्थगित करते समय 60 दिन का समय दिया गया था। 30 सितंबर और 1 अक्टूबर तक छात्रों को लगने लगा था कि सरकार की घोषणाओं का क्रियान्वयन उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। इसलिए आंदोलन की जगह एक नई समयसीमा और महापंचायत की चेतावनी सामने आई। 18 अक्टूबर तक की समयसीमा बीत गई। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सीमा है। 5 नवंबर तक उपलब्ध विश्वसनीय सार्वजनिक रिपोर्टिंग में मुझे इस महापंचायत के वास्तव में आयोजित होने या राज्यव्यापी आंदोलन फिर शुरू होने की पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इतना कहना उचित है कि छात्रों ने महापंचायत की चेतावनी दी थी, लेकिन उसके बाद की वास्तविक संगठनात्मक स्थिति पर छात्र नेताओं से ताजा प्रतिक्रिया जरूरी है।

CID जांच में क्या प्रगति हुई? 


अब बात उस मोर्चे की, जहां इन तीन महीनों में सबसे अधिक ठोस घटनाक्रम सामने आया है। यानी CID की जांच। 14वीं JPSC परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच के दौरान CID ने गिरफ्तारियां कीं और अदालत में आरोपपत्र दाखिल किए। अक्टूबर के अंत तक सामने आई चार्जशीट संबंधी रिपोर्टों में परीक्षा से पहले गोपनीय जानकारी साझा करने, कथित बिचौलियों के नेटवर्क और OMR शीट में हेरफेर जैसे आरोप शामिल थे। फिर 2 और 3 नवंबर को एक नया घटनाक्रम सामने आया। CID ने 14वीं JPSC मामले में दूसरी पूरक चार्जशीट दाखिल की। इसमें बुद्धेश्वर भगत, रमेश कुमार सहित 10 लोगों को आरोपी बनाया गया। 

लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में अब तक 34 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। चार्जशीट में अभ्यर्थियों से पैसे लेने, मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र और हस्ताक्षरित खाली चेक लेने, बिचौलियों के नेटवर्क और संदिग्ध बैंक लेनदेन की बात कही गई है। एक लैपटॉप से 24 अभ्यर्थियों की सूची मिलने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई, जिनमें 11 प्रारंभिक परीक्षा में सफल बताए गए। CID ने डिजिटल साक्ष्य, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन से जुड़े दस्तावेज अदालत में पेश किए हैं। यहां जांच की प्रगति को समझने के लिए तीन स्तर अलग-अलग रखने होंगे। पहला, गिरफ्तारी हुई है। दूसरा, आरोपपत्र दाखिल हुआ है। तीसरा, अदालत में आरोप साबित होना बाकी है। इन तीनों को एक ही बात नहीं माना जा सकता। इसी तरह 14वीं JPSC मामले में 34 गिरफ्तारियों और JPSC तथा JSSC-CGL के संयुक्त मामलों में कम से कम 50 गिरफ्तारियों की रिपोर्ट को अलग-अलग समझना होगा। 

लेकिन इस जांच ने एक बात जरूर स्पष्ट की है कि मामला केवल परीक्षा के प्रश्नपत्र तक सीमित नहीं है। CID कथित वित्तीय लेनदेन, बिचौलियों और परीक्षा प्रक्रिया के अलग-अलग स्तरों की जांच कर रही है। अब सवाल है कि क्या जांच का दायरा उन सभी लोगों और संस्थागत जिम्मेदारियों तक पहुंचेगा, जिनके बिना इतनी बड़ी अनियमितता संभव नहीं हो सकती थी? यह सवाल अभी बाकी है।

नवंबर में सबसे बड़ा सवाल, परीक्षा सुधार समिति कहां है?  


अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे महत्वपूर्ण और शायद सबसे निराशाजनक प्रशासनिक पहलू पर। 18 अगस्त को सरकार ने नोटिफिकेशन नंबर 5409 के माध्यम से अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में परीक्षा सुधार समिति बनाने की घोषणा की थी। समिति का काम था JPSC और JSSC की परीक्षा व्यवस्था का अध्ययन करना और भविष्य के लिए सुधारों की सिफारिश करना। उसे दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी थी। यानी 18 अक्टूबर तक सरकार के पास परीक्षा सुधार का एक ठोस खाका होना चाहिए था। लेकिन 3 नवंबर को लागातार ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की कि समिति का गठन ही नहीं हुआ है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर भी समझना होगा। 

26 अगस्त को सरकार ने विकास आयुक्त की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एक अलग समिति बनाई थी। इसमें कार्मिक और वित्त विभाग के सचिव शामिल थे। उस समिति का घोषित उद्देश्य JPSC और JSSC में पदस्थ अधिकारियों की सेवा शर्तों और नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा करना था। लेकिन यह अमिताभ कौशल वाली परीक्षा सुधार समिति का विकल्प नहीं थी। दोनों समितियों के काम अलग थे। इसलिए एक समिति का गठन हो जाना दूसरी समिति के गठन और कामकाज का प्रमाण नहीं है। अब जरा इस विरोधाभास को समझिए। सरकार ने भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों की जांच के लिए CID को लगाया। गिरफ्तारियां हुईं। चार्जशीट दाखिल हुई। लेकिन भविष्य में ऐसी गड़बड़ियां रोकने के लिए जिस विशेषज्ञ समिति को परीक्षा प्रणाली में सुधार सुझाना था, वह नवंबर की शुरुआत तक गठित नहीं हुई थी। यही वह जगह है जहां सरकार की घोषणा और उसके क्रियान्वयन के बीच का अंतर सबसे स्पष्ट दिखाई देता है।

सरकार के वादों का अंतिम हिसाब 


तो अब एक बार संक्षेप में सरकार के वादों का हिसाब कर लेते हैं। परीक्षाएं रद्द करने का फैसला हुआ। इस मोर्चे पर सरकार ने कार्रवाई की, लेकिन कई फैसले अदालत में चुनौती के अधीन हैं। CID जांच शुरू हुई और आगे बढ़ी। गिरफ्तारियां और चार्जशीट दाखिल हुईं। यह एक वास्तविक प्रगति है। CBI जांच की मांग पूरी नहीं हुई। उपलब्ध जानकारी में जांच CBI को सौंपने का आदेश नहीं मिला। ED जांच के वास्तविक परिणामों की पुष्टि अभी बाकी है। फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग करने का निर्णय हुआ, लेकिन उसके गठन और कामकाज की पुष्टि नहीं है। JPSC और JSSC में आंतरिक Vigilance Cell बनाने की घोषणा हुई, लेकिन इनके सक्रिय होने का प्रमाण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। और परीक्षा सुधार समिति, जिसका गठन 18 अगस्त को घोषित किया गया था, 3 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार अब तक गठित नहीं हुई थी। इस तरह देखें तो सरकार ने जांच और परीक्षा रद्द करने के स्तर पर कार्रवाई की है। 

लेकिन संस्थागत सुधार और जवाबदेही के मोर्चे पर कई महत्वपूर्ण सवाल अभी बाकी हैं। अब आगे क्या तीन महीने पहले झारखंड के युवाओं ने अपना आंदोलन स्थगित करते हुए सरकार को 60 दिन का समय दिया था। आज सवाल यह नहीं है कि अगस्त में कितने दिन आंदोलन चला था। सवाल यह है कि उस आंदोलन के बाद व्यवस्था में कितना बदलाव आया? क्या अगली भर्ती परीक्षा पहले से अधिक पारदर्शी होगी? क्या JPSC और JSSC के लिए कोई विश्वसनीय वार्षिक भर्ती कैलेंडर बनेगा? क्या परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी? क्या कथित अनियमितताओं में शामिल लोगों को कानून के अनुसार सजा मिलेगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सरकार उन अभ्यर्थियों को न्याय दे पाएगी जिन्होंने वर्षों की मेहनत और उम्मीद इस व्यवस्था पर भरोसा करके लगाई है? 

अगस्त में छात्रों ने आंदोलन स्थगित किया था। उन्होंने अपनी मांगें वापस नहीं ली थीं। अब सरकार के सामने चुनौती केवल पुरानी गड़बड़ियों की जांच करना नहीं है। चुनौती एक ऐसी भर्ती व्यवस्था बनाने की है जिस पर अगली पीढ़ी के अभ्यर्थी भरोसा कर सकें। क्योंकि सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं को केवल परीक्षा की तारीख नहीं चाहिए। उन्हें निष्पक्ष परीक्षा चाहिए, समय पर परिणाम चाहिए और अपनी मेहनत के सम्मान की गारंटी चाहिए। 60 दिन का भरोसा दिया गया था। तीन महीने बीत चुके हैं। अब झारखंड के युवाओं को घोषणाएं नहीं, नतीजे चाहिए।

शेयर करें WhatsApp X Facebook

संबंधित खबरें