झारखंड झारखंड नौकरी सीरीज़ एक्सप्लेनर

नौकरी सीरीज़ : झारखंड में दारोगा के 2,500 से ज्यादा पद खाली! सीएम हेमंत सोरेन जल्द निकालेंगे वैकेंसी?

झारखंड में दारोगा के 2,500 से ज्यादा पद खाली
झारखंड में दारोगा के 2,500 से ज्यादा पद खाली

जरा दिल पर हाथ रखकर सोचिए... जिस पुलिस महकमे के कंधों पर पूरे राज्य में अमन-चैन कायम रखने, अपराधियों पर नकेल कसने और आम आदमी की हिफाजत करने की जिम्मेदारी है, अगर वही महकमा मैनपावर की भारी कमी से जूझ रहा हो, तो कानून-व्यवस्था का क्या होगा? थाने में फरियादी पहुंचे तो उसकी फरियाद कौन सुनेगा? अपराधी बेखौफ घूम रहे हों तो उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस के पास पर्याप्त जवान कहां से आएंगे? और सबसे बड़ा सवाल... जब पुलिस ही खाली पदों के बोझ तले दबी हो, तो आम आदमी इंसाफ की उम्मीद किससे करे?

अब जरा झारखंड पुलिस के आंकड़ों पर गौर कीजिए। ये आंकड़े सिर्फ सरकारी फाइलों में दर्ज नंबर नहीं हैं, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था की एक बड़ी तस्वीर पेश करते हैं। राज्य में दारोगा यानी सब-इंस्पेक्टर के कुल 6,750 पद स्वीकृत हैं। लेकिन हकीकत यह है कि महज 4,200 दारोगा ही तैनात हैं। यानी 2,500 से ज्यादा पद खाली! सोचिए, करीब 700 थानों वाले राज्य में जांच, गश्ती, कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण का जिम्मा इतने कम अधिकारियों के भरोसे है।

और सिपाहियों की हालत तो इससे भी ज्यादा चिंताजनक है। 40 हजार स्वीकृत पदों के मुकाबले मैदान में बमुश्किल 15 हजार सिपाही हैं। यानी लगभग 62.5 फीसदी पद खाली! अब सवाल है कि जब थाने में अफसर और जवान ही नहीं होंगे, तो पुलिसिंग कैसे होगी? एक ही दारोगा कितने मामलों की जांच करेगा, कितनी जगह छापेमारी करेगा, कितनी रात गश्त करेगा और कितने फरियादियों की शिकायत सुनेगा? पुलिसकर्मियों पर काम का दबाव बढ़ेगा, जांच प्रभावित होगी और इसका खामियाजा आखिरकार आम जनता को भुगतना पड़ेगा।

लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू और भी ज्यादा तकलीफदेह है। एक तरफ पुलिस महकमे में हजारों पद खाली पड़े हैं, दूसरी तरफ राज्य के लाखों नौजवान खाकी वर्दी पहनने का ख्वाब लेकर सालों से इंतजार कर रहे हैं। झारखंड में 2018 के बाद से दारोगा की सीधी भर्ती का नया विज्ञापन नहीं आया है। यानी आठ साल से ज्यादा वक्त गुजर गया, लेकिन नई बहाली की राह नहीं खुली।

इन आठ सालों में कितने नौजवानों ने कोचिंग संस्थानों की फीस भरी, कितनी किताबें खरीदीं, कितनी रातें लाइब्रेरी में गुजारीं और कितनी बार दौड़ के मैदान में पसीना बहाया—इसका हिसाब किसी सरकारी फाइल में नहीं मिलेगा। किसी ने नौकरी की तैयारी के लिए घर की जिम्मेदारी टाल दी, किसी ने खेती-किसानी छोड़ दी, तो किसी ने अपनी उम्र का सबसे कीमती वक्त एक विज्ञापन के इंतजार में लगा दिया। मगर हर बार हाथ लगी तारीख, आश्वासन और मायूसी।

हुक्मरानों के बयान आते हैं, बैठकों की खबरें आती हैं, भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की बातें होती हैं। लेकिन नौजवानों के हाथ में अब तक वह विज्ञापन नहीं आया, जिसका उन्हें बेसब्री से इंतजार है। आखिर कब तक सरकारी नौकरी का सपना सिर्फ घोषणाओं और फाइलों में जिंदा रहेगा? क्या सरकार को पुलिस में खाली पद नजर नहीं आते? क्या उसे बेरोजगार युवाओं की उम्र निकलने की फिक्र नहीं है?

आज हम दारोगा भर्ती की इसी पूरी कहानी की पड़ताल करेंगे। खाली पदों का हिसाब, भर्ती में देरी की वजह, सरकार की तैयारी और उन नौजवानों का दर्द-जो खाकी पहनने के लिए सालों से मैदान में पसीना बहा रहे हैं।

क्योंकि यह महज एक भर्ती का मामला नहीं है। यह झारखंड की कानून-व्यवस्था, पुलिस की क्षमता और हजारों नौजवानों के भविष्य का सवाल है। सवाल सीधा है-जब पुलिस को दारोगा चाहिए और नौजवान नौकरी के लिए तैयार बैठे हैं, तो आखिर भर्ती का रास्ता रोक कौन रहा है?


झारखंड में 26 साल में सिर्फ दो बार हुई दारोगा बहाली की परीक्षा


जरा झारखंड में दारोगा भर्ती का इतिहास पलटिए। राज्य बने 26 साल होने जा रहे हैं, लेकिन पुलिस महकमे में दारोगा की सीधी भर्ती का रिकॉर्ड देखेंगे तो एक अजीब तस्वीर सामने आएगी। ऐसा लगता है मानो सरकारों के लिए दारोगा की नियुक्ति कोई नियमित प्रक्रिया नहीं, बल्कि कभी-कभार पूरी होने वाली रस्म बनकर रह गई है। जरूरत हर साल महसूस होती है, थानों में पद खाली रहते हैं, नौजवान तैयारी करते रहते हैं, लेकिन भर्ती का विज्ञापन सालों तक गायब रहता है। सवाल यह है कि जब राज्य में पुलिस अधिकारियों और थानेदारों की जरूरत लगातार बनी रही, तो Regular Recruitment का सिस्टम क्यों नहीं बन पाया?

राज्य गठन के बाद झारखंड में दारोगा की पहली बड़ी सीधी भर्ती के लिए साल 2008  में विज्ञापन जारी हुआ। लेकिन विज्ञापन आने और नियुक्तियां पूरी होने के बीच करीब चार साल गुजर गए। आखिरकार 2012 में दारोगा, सार्जेंट और कंपनी कमांडर के पदों पर नियुक्तियां हुईं। यानी पहली ही भर्ती ने नौजवानों को बता दिया कि झारखंड में वर्दी हासिल करने की राह आसान नहीं होने वाली। लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। नियुक्ति के बाद मेधा सूची में गड़बड़ी के आरोप लगे और मामला अदालत तक पहुंच गया। इस विवाद में 42 अधिकारियों को सेवा से हटाने की कार्रवाई हुई। बाद में अदालत के आदेश पर इन अधिकारियों की पुनर्बहाली हुई। यानी जिस भर्ती से पुलिस महकमे को नए अधिकारी मिलने थे, वह चयन प्रक्रिया के विवाद और लंबी कानूनी लड़ाई में उलझ गई।

इसके बाद दूसरी बड़ी सीधी बहाली का मौका आया 2017 में। इस भर्ती के तहत नियमित और बैकलॉग मिलाकर करीब 2,580 पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया चली। साल 2018 में नियुक्तियां पूरी हुईं। उस वक्त लगा कि अब पुलिस महकमे में अधिकारियों की कमी दूर करने के लिए नियमित भर्ती का सिलसिला शुरू होगा। लेकिन यह उम्मीद भी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रही।

2018 के बाद से आज तक दारोगा की सीधी भर्ती का नया विज्ञापन सामने नहीं आया। यानी एक पूरी पीढ़ी तैयारी करते-करते इंतजार में खड़ी रह गई। इस दौरान सरकारें बदलीं, अफसर बदले, भर्ती की जरूरत बनी रही, लेकिन नई नियुक्ति का रास्ता नहीं खुला।

आखिर दारोगा की भर्ती कोई ऐसी नौकरी नहीं है, जिसकी जरूरत पांच या आठ साल में एक बार महसूस हो। अपराध हर दिन होते हैं, थानों में मामले हर दिन दर्ज होते हैं और कानून-व्यवस्था की चुनौती हर दिन सामने आती है। ऐसे में पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति भी लगातार होनी चाहिए। लेकिन झारखंड में यह सिलसिला दो बड़ी भर्तियों और उनके बीच लंबे अंतराल तक सिमटकर रह गया है।

यानी झारखंड में दारोगा बनने का सपना अब सिर्फ परीक्षा पास करने का नहीं, बल्कि भर्ती का विज्ञापन आने तक इंतजार करने का भी हो गया है। सवाल है—क्या सरकार इस सिलसिले को तोड़ेगी, या अगली पीढ़ी भी इसी इंतजार की विरासत लेकर आगे बढ़ेगी?


975, 800 या 1500 पद—बहाली की चर्चाएं हजार, कागजों से बाहर क्यों नहीं आ रहा विज्ञापन?


अब आते हैं इस पूरी दास्तान के सबसे अहम, सबसे बड़े और सबसे पेचीदा सवाल पर। आखिर झारखंड में दारोगा की यह बहाली अटकी कहां है, किस बेदर्द मुकाम पर जाकर इसका दम घुट रहा है? कभी सुरीली जुबान से 975 पदों पर नियुक्ति की चर्चा होती है, कभी गलियारों में 800 से ज्यादा पद भरने की बात गूंजती है, और कभी अचानक 1,500 पदों पर सीधी भर्ती का नया शिगूफा छोड़ दिया जाता है। यानी आंकड़े बदलते रहते हैं, हुक्मरानों के दावे रोज नए लिबास में सामने आते हैं, मगर इन सबके बीच बेचारे नौजवानों के हाथों में अब तक भर्ती का एक मुकम्मल और आधिकारिक विज्ञापन नहीं पहुंचा है!

जरा सोचिए, फाइल आखिर किसकी मेज की कैद में दम तोड़ रही है? एक तरफ पुलिस मुख्यालय में खाली पदों का हिसाब-किताब लगाया जाता है, दूसरी तरफ यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि 'प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है।' कागजों पर करीब 2,500 रिक्त पद हैं…कुछ सीधी भर्ती से भरे जाने हैं, तो कुछ विभागीय प्रोन्नति यानी प्रमोशन से। लेकिन एस्पिरेंट्स के जेहन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाईसाहब, दूध का दूध और पानी का पानी करके बताइए कि सीधी भर्ती में आखिर हाथ क्या लगेगा? 800 पद, 975 या फिर वो जादुई 1,500 का आंकड़ा? हुक्मरानों के पास इस सवाल का कोई पुख्ता और सीधा जवाब क्यों नहीं है?

और कहानी सिर्फ पदों की गिनती पर आकर थोड़े ही खत्म होती है! महकमे के भीतर एएसआई से दारोगा बनने की लंबी प्रोन्नति प्रक्रिया और सीनियरिटी लिस्ट का रायता अलग फैला है। वरीयता सूची निकलेगी, उस पर आपत्तियां मांगी जाएंगी, फिर कानूनी अड़चनों के कांटे बोए जाएंगे…इस अंतहीन चक्की में पिसकर जब तक विभागीय प्रोन्नति में देरी होती है, तब तक खाली पदों का यह खौफनाक बोझ और ज्यादा गहराता जाता है।

लेकिन जनाब, असली पेंच तो उससे भी बड़ा है! क्या आपको पता है कि इम्तिहान का पैटर्न क्या होगा? खेल के नियम क्या होंगे? फिजिकल टेस्ट पहले होगा या रिटेन एग्जाम? एजेंसी कौन सी इम्तिहान कराएगी-वही पुरानी बदनाम जेएसएससी (JSSC) या कोई नई पारदर्शी व्यवस्था? इन तमाम अनगिनत सवालों पर सिर्फ गोलमोल चर्चाएं होती रही हैं। और जब तक इन तमाम नियमों को अंतिम रूप देकर गजट या आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हो जाती, तब तक नौजवानों के लिए यह सब सिर्फ कयासों का एक ऐसा बाजार है, जहां उम्मीदें रोज दम तोड़ती हैं।

पिछली परीक्षाओं में जेएसएससी के पेपर्स के जिस तरह से तार-तार होने की खबरें आईं, धांधली और पेपर लीक के काले सायों ने युवाओं के भरोसे की धज्जियां उड़ाईं, उसके बाद से हर दिल में एक ही डर बैठा है। युवाओं को सिर्फ इम्तिहान की तारीख नहीं चाहिए, उन्हें एक ऐसा फुलप्रूफ सिस्टम चाहिए जहां पेपर लीक का कोई भूत न हो, सेटिंग-गेटिंग की कोई गुंजाइश न बचे और सिर्फ और सिर्फ खून-पसीना बहाने वाले मेहनतकश उम्मीदवार का ही चयन हो। अगर खाकी की इस पवित्र वर्दी की भर्ती में भी पारदर्शिता पर दाग लगेंगे, तो इस सूबे की कानून-व्यवस्था की रीढ़ पर से लोगों का भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा।

लिहाजा, अब वक्त आ गया है कि सरकार और पुलिस मुख्यालय के जिम्मेदार आधिकारियों से कुछ सीधे और दो-टूक सवाल पूछे जाएं।

पहला सवाल: करीब 2,500 रिक्तियों में से वास्तव में सीधी भर्ती के लिए कितने पदों पर मुहर लगी है?

दूसरा सवाल: क्या फाइल सचमुच गृह विभाग और कार्मिक विभाग की सीमाओं को पार कर चुकी है या अभी भी लाल फीतों में उलझी है?

और सबसे ज्वलंत सवाल: विज्ञापनों के इस अंतहीन इंतजार का अंत कब होगा और वह कौन सी तारीख होगी जब जेएसएससी की वेबसाइट पर इसका आधिकारिक नोटिफिकेशन चमकेगा?

 याद रखिए, किसी मीटिंग में मौखिक चर्चा कर लेना, फाइलों को एक टेबल से उठाकर दूसरी टेबल पर पटक देना-कोई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होने का सुबूत नहीं होता। झारखंड के इन बेबस नौजवानों को अब खोखले आंकड़ों का यह खेल और कतई बर्दाश्त नहीं है। इन्हें तारीख चाहिए, अधिसूचना चाहिए और अपने हक की नौकरी चाहिए!


दारोगा नहीं तो जांच कैसे, जांच नहीं तो इंसाफ कैसे—सरकार जवाब दे!


आइए अब इस पूरी बहस को सिर्फ नौकरी और इम्तिहान के दायरे से थोड़ा आगे ले चलते हैं और बात करते हैं उस दर्द की, जो इस राज्य का आम नागरिक रोज़ झेल रहा है।

क्योंकि जनाब, एक दारोगा या सब-इंस्पेक्टर की जिम्मेदारी सिर्फ थाने की चारदीवारी में बैठकर मुंशी की तरह एफआईआर दर्ज कर लेना भर नहीं होती। किसी संगीन जुर्म की तह तक जाना, Scientific Evidence जुटाना, अपराधियों को दबोचना और अदालत में ऐसा फूलप्रूफ केस पेश करना कि मुजरिम को सजा मिल सके, यह सब एक दारोगा का असल फर्ज है।

लेकिन जब झारखंड के थानों की जमीनी हकीकत यह हो कि एक ही अधिकारी के कंधों पर दर्जनों, बल्कि 50 से 100 मुकदमों की जांच का पहाड़ जैसा बोझ लाद दिया जाए, तो क्या होगा? नतीजा यह निकलता है कि इन्वेस्टिगेशन में बेतहाशा देरी होती है, पीड़ित दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होते हैं और न्याय फाइलों के मकड़जाल में दम तोड़ देता है।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'प्रकाश सिंह फैसले' और देश में लागू नए आपराधिक कानून (BNSS) के तहत यह दावा किया गया था कि थानों में 'लॉ एंड ऑर्डर' और 'इन्वेस्टिगेशन'  यानी अपराध अनुसंधान दोनों विंग्स को पूरी तरह अलग-अलग किया जाएगा ताकि जांच तेज हो सके। लेकिन झारखंड के इन बदहाल थानों से पूछिए कि क्या आपके पास इस व्यवस्था को चलाने के लिए पर्याप्त दारोगा हैं? जब एक ही बेचारा अधिकारी कभी वीआईपी ड्यूटी संभालेगा और कभी मर्डर मिस्टीरियस की फाइल खोलेगा, तो कानून के राज का यह ढोल कब तक पीटा जाएगा?

लिहाजा, अब सवाल सीधे तौर पर हुक्मरानों और सरकार की जवाबदेही पर है।

पहला और सबसे तीखा सवाल: जब पुलिस महकमे में हजारों पद दीमक की तरह खाली पड़े हैं, तो सरकार एक निश्चित और पारदर्शी भर्ती की Time-line क्यों तय नहीं करती?

दूसरा सवाल: क्या इस सूबे में युवाओं को उनका हक पाने के लिए हर बार सड़कों पर उतरना पड़ेगा, लाठियां खानी पड़ेंगी या अदालतों के दरवाजे खटखटाने पड़ेंगे, तभी फाइलें आगे बढ़ेंगी?

और तीसरा ज्वलंत सवाल: क्या झारखंड सरकार यूपीएससी की तर्ज पर पुलिस बलों—खासकर दारोगा और सिपाहियों की नियुक्तियों के लिए कोई एक निश्चित Annual Recruitment Calendar जारी करने का माद्दा रखती है?

झारखंड का नौजवान लाइब्रेरी की ठंडी रोशनी में रातों जागकर सिर्फ एक मुकद्दर की तलाश नहीं कर रहा, वह खाकी पहनकर इस समाज की हिफाजत करना चाहता है। लेकिन दूसरी तरफ थानों में घटते अधिकारियों का दबाव बढ़ता जा रहा है। इसलिए आज सवाल सिर्फ यह भर नहीं है कि बेरोजगार युवाओं को नौकरी का परवाना कब मिलेगा? असल और बड़ा सवाल यह है कि इस राज्य की पुलिस व्यवस्था और कानून के राज को मजबूत करने के लिए यह हुकूमत आखिर किस क्यूपिड का, किस चमत्कार का इंतजार कर रही है?

याद रखिए, पुलिस महकमे में खाली पड़े ये पद सिर्फ सरकारी कागजों के ठंडे आंकड़े नहीं होते। हर एक खाली पद के पीछे किसी थाने का बढ़ता बोझ होता है, किसी मां के आंसुओं का लंबा इंतजार होता है और किसी बेकसूर को इंसाफ मिलने की राह में बिछी हुई कांटों भरी वो सड़क होती है, जिसका अंत कभी नहीं आता!

शेयर करें WhatsApp X Facebook

संबंधित खबरें