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JPSC परीक्षा घोटाला : अभय तिवारी, खियांग्ते समेत 12 पर चार्जशीट दायर, ज़मानत से पहले कसा शिकंजा, अब आगे क्या?

JPSC परीक्षा घोटाला मामले में चार्जशीट दायर
JPSC परीक्षा घोटाला मामले में चार्जशीट दायर
अभय तिवारी ने प्रतियोगी परीक्षाओं में सेटिंग के लिये एक ऑफिस खोल रखा था, उसका बॉस रामवीर सिंह खाली ओएमआर शीट का मास्टरमाइंड था, इसमें जेपीएससी की अधिकारी श्वेता गुप्ता की मिलीभगत थी, जिन्हें तोहफ़े में हवाई यात्रा के लिये फ्लाइट की टिकट दी गयी थी. सीआईडी की जांच पड़ताल में अब तक ये तथ्य सामने आ चुके हैं. और अब सीआईडी ने इन आरोपों का अपनी चार्जशीट में भी उल्लेख किया है. जेपीएससी घोटाला मामले के आरोपियों के खिलाफ सीआईडी ने आखिरकार चार्जशीट दाखिल कर दी है. आरोपियों की फेहरिस्त में एल खियांग्ते, अभय तिवारी, श्वेता गुप्ता, रामवीर सिंह समेत 12 लोगों के नाम शामिल हैं. सीआईडी ने समय रहते बड़ा कदम उठाया है.

12 लोगों के खिलाफ दाखिल हुई चार्जशीट

जेपीएससी की परीक्षाओं में हुई धांधली और भ्रष्टाचार की परतें अब धीरे-धीरे खुलने लगी हैं। सीआईडी ने अपनी गहन जांच के बाद अदालत में एक विस्तृत आरोप पत्र चार्जशीट दाखिल कर दी है। इस बहुचर्चित परीक्षा घोटाला मामले में कुल 12 लोगों को आरोपी बनाया गया है। 

आरोपियों की इस सूची में जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल खियांग्ते, पूर्व उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता, टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह, एजेंसी के मार्केटिंग मैनेजर अभय तिवारी, टीडीपीएल कर्मी मो उस्मान, मो एबाद, हेमंत कुमार वर्मा, प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार, सोनू कुमार, अरविंद कुमार और सुमन सौरभ का नाम शामिल शामिल हैं। इन सभी के खिलाफ बीएनएस और झारखंड प्रतियोगी परीक्षा अधिनियम-2023 के तहत ये चार्जशीट दाखिल की गयी है। जांच एजेंसी द्वारा कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि यह केवल एक सामान्य गड़बड़ी नहीं थी, बल्कि बेहद ही सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र था।

रामवीर सिंह: खाली ओएमआर शीट घोटाले का मास्टरमाइंड

जेपीएससी की परीक्षाओं का संचालन करने वाली एजेंसी टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह को इस पूरे खाली ओएमआर शीट घोटाले का मास्टरमाइंड माना गया है। दायर चार्जशीट में सीआईडी ने बताया है कि रामवीर सिंह चुनिंदा अभ्यर्थियों को परीक्षा में केवल वही Questions solve करने की सलाह देता था जो उन्हें आते थे और बाकी ओएमआर शीट खाली छोड़ने को कहता था। बाद में स्कैनिंग के समय खाली छोड़े गए आंसर्स को भरकर नंबर बढ़ा दिए जाते थे। 


इस काम के लिए फर्जी तरीके से आंसर शीट्स को बदलने, पीडीएफ में एडिटिंग करने और बैकएंड सर्वर में सीधे फेरबदल करने जैसे रास्ते अपनाए गए। उसने अपने परिवार के सदस्यों और जान-पहचान वालों के बैंक खातों में अभ्यर्थियों से अवैध रूप से लाखों रुपये ट्रांसफर करवाए थे।

अभय तिवारी: सिंडिकेट का मुख्य संचालक

अभय तिवारी
अभय तिवारी

इस पूरे खेल को ज़मीन पर उतारने का काम टीडीपीएल का मार्केटिंग मैनेजर अभय तिवारी कर रहा था। सीआईडी की चार्जशीट में अभय तिवारी को संगठित सिंडिकेट का मुख्य संचालक बताया गया है. चार्जशीट के मुताबिक, अभय तिवारी ने रांची के लालपुर क्षेत्र में बाकायदा एक दफ्तर खोल रखा था। अभय अभ्यर्थियों को झांसे में लेकर उनसे 5 लाख रुपये से लेकर अंतिम चयन के लिए 25 लाख रुपये तक वसूलता था। अभ्यर्थियों पर दबाव बनाए रखने और गारंटी के तौर पर वह उनके मूल शैक्षणिक प्रमाण पत्र, ब्लैंक चेक और यहां तक कि जमीन के कागज़ात भी अपने पास गिरवी रख लेता था। वह अपने दफ्तर का किराया और कंपनी निदेशकों के होटल का बिल भी अपने ही खाते से भरता था। चार्जशीट में ये भी कहा गया है कि टीडीपीएल का कर्मचारी रहने अभय तिवारी ने सीजीएल, FRO, ACF, FSO समेत कई परीक्षायें फर्जी तरीके से पास कीं. अपना चयन दिखाकर वह अभ्यर्थियों को झांसे में लेता था.

श्वेता कुमारी गुप्ता: आंसर-की लीक और बदले में फ्लाइट की टिकटें

श्वेता गुप्ता
श्वेता गुप्ता

वहीं, आयोग के भीतर से इस सिंडिकेट को पूरा समर्थन दे रही थीं तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता। दायर चार्जशीट के अनुसार, श्वेता गुप्ता ने 14वीं जेपीएससी सिविल सेवा पीटी परीक्षा की आधिकारिक आंसर-की जारी होने से पहले ही उसे व्हाट्सएप के जरिए लीक कर दिया था। दूसरे विभाग में तबादला होने के बाद भी वह गोपनीय प्रक्रिया में हस्तक्षेप करती रहीं। इस मदद के एवज में परीक्षा एजेंसी के कर्मचारियों ने श्वेता गुप्ता और उनके परिजनों के लिए रांची से दिल्ली और बेंगलोर की फ्लाइट की टिकटें बुक कराई थीं। सीआईडी को श्वेता गुप्ता के कॉल डिटेल रिकॉर्ड से पेपर लीक गिरोह के साथ लगातार बातचीत और उनके नियंत्रण वाले परिसर से संवेदनशील परीक्षा सामग्री बरामद होने के सबूत मिले हैं.

मो. उस्मान और मो. एबाद: डेटा में हेरफेर

टीडीपीएल एजेंसी के कर्मचारी मो. उस्मान और मो. एबाद अभ्यर्थियों की कॉपियों को पेन ड्राइव और हार्ड डिस्क के जरिए परिसर से बाहर ले जाकर फर्जी तरीके से बैकएंड डेटा में हेरफेर करते थे। सीआईडी द्वारा दायर आरोप पत्र के मुताबिक, मो. उस्मान के मोबाइल फोन पर ही श्वेता गुप्ता ने आंसर की भेजी थी. उस्मान में FRO मेंस 2026 की आंसर शीट का संवेदनशील डेटा बाहर निजी कंप्यूटर पर भेजा था. उस्मान की ईमेल आईडी और ट्रैविल पोर्टल के ज़रिये ही श्वेता गुप्ता के लिये फ्लाइट की टिकट बुक करायी गयी थी. सीआईडी का आरोप है कि OMR शीट के बंडलों से छेड़छाड़ और डेटा में फेरबदल की साज़िश में उस्मान सीधे तौर पर शामिल था. जबकि मो एबाद जेपीएससी से गोपनीय परीक्षा सामग्री, विशेषकर FRO मेंस परीक्षा 2026 की कॉपियों को पेनड्राइव और हार्ड डिस्क के ज़रिये बाहर निकालने और लालपुर में निजी परिसर के सिस्टम में फीड करने का काम करता था.

डिफॉल्ट बेल से पहले सीआईडी का कानूनी शिकंजा

इन तमाम आरोपों को सीआईडी ने अपनी चार्जशीट में शामिल किया है. कानूनी प्रक्रिया के दृष्टिकोण से इस मामले में सीआईडी द्वारा समय रहते चार्जशीट दाखिल करना बेहद महत्वपूर्ण कदम था। भारतीय कानून के अनुसार, जब किसी आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है, तो जांच एजेंसी के पास मामले की जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट पेश करने के लिए 90 दिनों का तय समय होता है। इस मामले में कई मुख्य आरोपियों को 22 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। यदि सीआईडी 90 दिनों की इस तय समय-सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं करती और इसमें एक भी दिन की देरी हो जाती, तो आरोपियों को अदालत से डिफॉल्ट बेल का कानूनी अधिकार मिल जाता। 

क्या होती है डिफॉल्ट बेल?

डिफॉल्ट बेल वह प्रक्रिया है जिसके तहत अगर पुलिस या जांच एजेंसी तय समय में आरोप पत्र दाखिल करने में विफल रहती है, तो आरोपी ज़मानत पाने का हक़दार हो जाता है, जिससे वह जेल से बाहर आ सकता है. 

डिफॉल्ट बेल
डिफॉल्ट बेल

डिफॉल्ट बेल का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक को बिना किसी ठोस आरोप-पत्र के या जांच एजेंसियों की सुस्ती और देरी के कारण अनिश्चित काल तक जेल में न सड़ना पड़े. सीआईडी ने अपर न्यायायुक्त प्रथम की अदालत में अवकाश के दौरान शून्यकाल में पुख्ता तकनीकी, वित्तीय और फॉरेंसिक साक्ष्यों के साथ चार्जशीट दाखिल की, और आरोपियों के जेल से बाहर आने के रास्ते बंद कर दिये.

आगे की कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई

अब चार्जशीट दाखिल होने का सीधा मतलब यह है कि सीआईडी ने अपनी प्रारंभिक जांच पूरी कर ली है और उसके पास आरोपियों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। इसके बाद अब कोर्ट मामले में पेश किए गए फॉरेंसिक, डिजिटल, वित्तीय और दस्तावेजी साक्ष्यों की समीक्षा करेगा। समीक्षा के बाद अदालत यह तय करेगी कि आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, और इस आधार पर कोर्ट मामले का संज्ञान लेगा। संज्ञान लेने के बाद सभी आरोपियों या उनके वकीलों को चार्जशीट, गवाहों के बयान और सबूतों की कॉपी सौंपी जाएंगी ताकि वे अदालत में अपने बचाव की कानूनी तैयारी कर सकें और इसके बाद अदालत में औपचारिक ट्रायल यानी मुकदमे की शुरुआत होगी। सीआईडी द्वारा दायर चार्जशीट पर पहली सुनवाई आगामी 26 अक्टूबर को होगी. अब जल्द ही मामले में दूसरा आरोप पत्र भी दाखिल किया जायेगा. बहरहाल, अब ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत इन सबूतों के आधार पर आगे क्या रुख अपनाती है, और इस पूरे षड्यंत्र में शामिल अन्य चेहरों पर कानून का शिकंजा कब और कैसे कसता है.

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