31 साल तक बना रहा अब्दुल जब्बार, अब घर लौटा हिंदू युवक; एक ट्रेन के सफर ने बदल दी पूरी ज़िदगी
साल 1995 में ट्रेन के सफर के दौरान बिछड़ा था मासूम पिंटू
इस अनोखी और दर्दभरी कहानी की शुरुआत साल 1995 में हुई थी। बिहार के कटिहार जिले में रहने वाला पिंटू उस वक्त महज 8 साल का एक नासमझ बच्चा था। वह अपने कुछ दोस्तों के साथ ट्रेन में सवार हुआ था। सफर के दौरान उसे गहरी नींद आ गई। जब उसकी आंख खुली, तो ट्रेन काफी दूर निकल चुकी थी और वह पश्चिम बंगाल के राधिकापुर इलाके में पहुंच गया था। इतने छोटे बच्चे के लिए अचानक अनजान जगह पर पहुंचना बहुत डरावना था। वह पूरी तरह अकेला और बेसहारा हो चुका था, जिसे अपने घर लौटने का रास्ता तक नहीं पता था।
अब्दुल रहीम के परिवार ने दी थी पनाह और नया नाम
राधिकापुर में जब पिंटू अकेला भटक रहा था, तब वहां अब्दुल रहीम नाम के शख्स की नजर उस पर पड़ी। अब्दुल रहीम ने उस लाचार बच्चे को सहारा दिया और उसे अपने घर ले गए। उन्होंने पिंटू को अपने परिवार के एक सदस्य की तरह पाला-पोसा, उसे भरपूर प्यार दिया और उसका नाम बदलकर अब्दुल जब्बर रख दिया। पिंटू यानी अब्दुल जब्बर उसी मुस्लिम परिवार के माहौल में बड़ा हुआ और उसने वहीं रहकर अपनी आगे की जिंदगी के रास्ते तय किए।
दिल्ली में काम के दौरान हुई किस्मत की खोज
समय का पहिया घूमता रहा और अब्दुल जब्बर बड़ा होकर कमाने के लिए दिल्ली चला गया। रोजी-रोटी की तलाश में वह दिल्ली में मजदूरी करने लगा। एक दिन उसकी मुलाकात मनिहारी के कुछ लोगों से हुई। बातचीत के दौरान उसने अपने अतीत का जिक्र किया और बताया कि उसके पिता का नाम मोतीलाल यादव है तथा वह कटिहार का रहने वाला है। मनिहारी के उन लोगों ने उसकी बात को गंभीरता से लिया और उसके परिवार की तलाश शुरू कर दी। काफी पूछताछ और खोजबीन के बाद आखिरकार उन्हें कटिहार के कांटाकोष गांव में उसके असली परिवार का पता मिल गया।
आंख के निशान ने मां को दिलाई बेटे की याद
जब अब्दुल जब्बर 31 साल बाद अपने असली गांव और घर पहुंचा, तो शुरुआत में उसकी मां उसे पहचान नहीं पाईं। इतने लंबे अंतराल के बाद किसी भी मां के लिए अपने बच्चे को तुरंत पहचानना मुमकिन नहीं होता। लेकिन तभी मां की नजर उसकी आंख के ऊपर बने एक पुराने कटने के निशान पर पड़ी। उस निशान को देखते ही मां का दिल धड़क उठा और उन्हें अपने उसी छोटे बच्चे की याद आ गई जो बरसों पहले खो गया था। इसके बाद माता-पिता और भाई ने उसे रोते हुए अपने गले से लगा लिया।
अब सामने खड़ी है एक बड़ी दुविधा
अपनों से मिलने की खुशी के बीच अब अब्दुल जब्बर के सामने एक बहुत बड़ी मानसिक दुविधा खड़ी हो गई है। उसके सामने यह सवाल है कि वह अपनी आगे की ज़िंदगी किसके साथ बिताए—उस जन्म देने वाले माता-पिता के साथ जिन्होंने उसके बिना 31 साल बिताए, या फिर उस परिवार के साथ जिसने उसे प्यार से पाला-पोसा और उसे इंसानियत की पहचान दी। यह स्थिति वाकई बहुत कठिन है, लेकिन यह घटना इंसानियत और तकदीर के अनूठे मेल की एक अनोखी मिसाल बन गई है।