देश झारखंड झारखंड एक्सप्लेनर

केंद्र और झारखंड के बीच नल जल योजना बजट का विवाद सुलझा, अब केंद्र सरकार देगी 2 हजार करोड़ रुपए

झारखंड में हर घर नल जल योजना बजट का विवाद सुलझा
झारखंड में हर घर नल जल योजना बजट का विवाद सुलझा
झारखंड के ग्रामीण इलाकों में सालों से जारी पानी का संकट और केंद्र-राज्य के बीच का प्रशासनिक तनाव अब आखिरकार खत्म होने को है। लंबे समय से अटकी 'हर घर नल-जल योजना' को रफ्तार देने के लिए केंद्र सरकार ने आखिरकार 2 हजार करोड़ रुपये की राशि की मंजूरी दे दी है। इसी के साथ पिछले दो वर्षों से केंद्र और राज्य सरकार के बीच मचे उसे सियासी घमासान पर विराम लग गया है, जिसकी वजह से राज्य के ग्रामीण विकास की रफ्तार थम सी गयी थी और जिसके कारण राज्य के लाखों परिवारों की प्यास बुझाने की गति धीमी पड़ गयी थी। इस राहत भरे फैसले के बाद अब यह उम्मीद जगी है कि राज्य के दूर दराज़ के गांवों तक नल का साफ पानी तेज़ी से पहुंचेगा। इस वित्तीय मंजूरी के बाद अब ये सवाल स्वाभाविक रूप से उठने लगे हैं, कि आखिर किन नीतियों के पेंच से ये टकराव शुरू हुआ था, क्यों अचानक अप्रैल 2024 में केंद्र ने फंड रोक दिया था, इसका आम जनता व ठेकेदारों पर क्या असर पड़ा? साथ ही, जो योजना 2024 में ही पूरी होनी थी, वह अब 2028 तक क्यों खिंच गयी? और वर्तमान में झारखंड के विभिन्न ज़िलों में इसकी ज़मीनी हक़ीकत क्या बयां करती है?

केंद्र और राज्य के बीच टकराव की शुरुआत

जल जीवन मिशन की शुरुआत 15 अगस्त 2019 को हुई थी। इस योजना का मूल सिद्धांत यह था कि केंद्र और राज्य सरकारें 50-50 प्रतिशत की हिस्सेदारी में मिलकर काम करेंगी। इसका सीधा सा मतलब था कि आधी राशि केंद्र देता और आधी राशि राज्य को अपने बजट से लगानी थी। योजना का उद्देश्य सभी ग्रामीण परिवारों को प्रति व्यक्ति हर दिन 55 लीटर गुणवत्तापूर्ण पेयजल उपलब्ध कराना था। 
नल जल योजना
नल जल योजना
शुरुआती दौर में योजना का काम आगे बढ़ा, लेकिन कोरोना महामारी और बाद के समय में दोनों सरकारों के बीच तालमेल बिगड़ने लगा। केंद्र सरकार का आरोप था कि झारखंड सरकार अपने हिस्से का पैसा समय पर जारी नहीं कर रही है और काम की रफ्तार काफी धीमी है। वहीं, राज्य सरकार का तर्क था कठोर भूगर्भीय संरचना, जल स्रोतों की अनिश्चितता जैसी ज़मीनी चुनौतियों और भौगोलिक विषमताओं के कारण काम में वक्त लग रहा है। यही नीतिगत मतभेद और बजट शेयरिंग का पेंच धीरे-धीरे बड़े सियासी टकराव में बदल गया।
फंड पर रोक: अप्रैल 2024 का कड़ा फैसला

टकराव उस वक्त अपने चरम पर पहुंच गया जब केंद्र सरकार ने अप्रैल 2024 के बाद इस योजना के तहत दी जाने वाली अपनी वित्तीय सहायता पर पूरी तरह रोक लगा दी। केंद्र सरकार ने साफ रुख अपनाया कि जब तक राज्य सरकार पहले से दी गई राशि का हिसाब नहीं देती और अपने हिस्से का बकाया बजट खर्च नहीं करती, तब तक आगे का फंड जारी नहीं किया जाएगा। 

केंद्र का स्पष्ट कहना था कि बचे हुए काम को पूरा करने के लिए राज्य को अपने संसाधनों का इस्तेमाल करना होगा। फंड रोके जाने के बाद योजना का काम लगभग ठप पड़ गया और नए टेंडरों और पुराने भुगतानों पर ब्रेक लग गया।

राज्य सरकार की केंद्र से गुहार और बजट का इंतज़ाम

केंद्र द्वारा फंड रोके जाने के बाद झारखंड सरकार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। ठेकेदारों का भुगतान अटकने लगा और काम बंद होने की नौबत आ गई। इस स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार और पेयजल एवं स्वच्छता विभाग ने केंद्र से बार-बार अनुरोध किया। राज्य के पेयजल मंत्री ने कई बार केंद्रीय मंत्री से मिलकर और पत्र लिखकर राशि आवंटित करने का आग्रह किया। राज्य ने अपनी वित्तीय स्थिति का हवाला देकर केंद्र से ढील देने की मांग की। जब केंद्र अपने फैसले पर अड़ा रहा, तो स्थिति को संभालने के लिए राज्य के वित्त विभाग ने पिछले वित्तीय वर्ष में करीब 500 करोड़ रुपये आवंटित किए, ताकि कुछ हद तक ठेकेदारों के बकाए का भुगतान किया जा सके और काम पूरी तरह बंद न हो।

केंद्र सरकार के फंड रुकने का असर


केंद्र सरकार द्वारा राशि रोके जाने का सीधा और गंभीर असर जमीनी स्तर पर दिखाई दिया। राज्य के कई जिलों में पाइपलाइन बिछाने और टंकियां बनाने का काम बीच में ही अटक गया। इसके कारण ठेकेदारों के करीब 6,000 करोड़ रुपये से ज्यादा फंस गये। इसमें मल्टी विलेज स्कीम में लगभग 2,400 करोड़ और सिंगल विलेज स्कीम में तकरीबन 3,500 करोड़ रुपये शामिल हैं। 

अधिकतर ठेकेदारों ने बैंकों से लोन लेकर काम शुरू किया था, भुगतान न मिलने पर वे डिफॉल्टर होने लगे। जिन गांवों में पाइपलाइन बिछ चुकी थी, वहां पानी की टंकियां तैयार नहीं हो सकीं, और जहां टंकियां बन गईं, वहां घर-घर तक नल कनेक्शन नहीं पहुंच पाया। राज्य के लाखों ग्रामीण परिवार प्राकृतिक जल स्रोतों पर ही निर्भर रहने को मजबूर रहे।


डेडलाइन में बदलाव: 2024 का लक्ष्य अब 2028 क्यों हुआ?

शुरुआती योजना के मुताबिक, देश के सभी ग्रामीण परिवारों को दिसंबर 2024 तक नल का जल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन 2020 और 2021 में कोरोना महामारी के कारण लगभग दो साल तक काम बुरी तरह प्रभावित रहा। इसके अलावा केंद्र और राज्य के बीच दो साल तक चले वित्तीय गतिरोध के कारण काम काफी पिछड़ गया। 

झारखंड के पहाड़ी और पठारी इलाकों में पाइपलाइन बिछाना और बोरिंग करना मैदानी इलाकों की तुलना में काफी कठिन और समय लेने वाला काम है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने योजना की अवधि को बढ़ाकर दिसंबर 2028 तक कर दिया है, ताकि छूटे हुए काम को गुणवत्ता के साथ पूरा किया जा सके।

वर्तमान स्थिति और आगे की राह


वर्तमान में झारखंड में इस योजना के तहत कुल 62 लाख 52 हजार 346 ग्रामीण परिवार चिन्हित किए गए हैं, जिनमें से अब तक 34 लाख 65 हजार 959 घरों यानी लगभग 55.43 प्रतिशत घरों तक ही नल का जल पहुंचाया जा सका है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, 18 जुलाई 2026 तक देश के लगभग 82% ग्रामीण परिवारों तक नल कनेक्शन पहुंच चुका है। इस मामले में पाकुड़ और गोड्डा जैसे ज़िले काफी पीछे हैं। 

अब केंद्र सरकार ने 2,000 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जिनमें से स्मॉल विलेज स्कीम के तहत 116 करोड़ रुपये जारी भी कर दिए गए हैं और इतनी ही राशि राज्य सरकार को भी देनी होगी। केंद्र ने सख्त शर्त रखी है कि राज्य पहले अपने हिस्से की पूरी राशि खर्च करे, उसके बाद ही केंद्र से आगे की किश्तें मिलेंगी। राज्य सरकार अब अपने हिस्से का फंड जारी कर ठेकेदारों का भुगतान करने और अटके हुए कामों को तेजी से पूरा करने की तैयारी में है।


केंद्र से मिली 2,000 करोड़ की यह वित्तीय मंजूरी यकीनन एक बड़ी राहत है।  नीतियां और बजट भी अपनी जगह हैं, लेकिन मूल सवाल यही है कि क्या 2028 तक झारखंड के हर एक ग्रामीण परिवार तक साफ पेयजल पहुंच पाएगा? या सियासी खींचतान फिर किसी पेंच में तब्दील हो जाएगी? वैसे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल इस मुद्दे पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं।
शेयर करें WhatsApp X Facebook

संबंधित खबरें