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नौकरी सीरीज़ : JTET अभ्यर्थी क्यों पूछ रहे ये 3 सवाल, हेमंत सरकार देगी जवाब; 2027 में शिक्षकों की बंपर वैकेंसी!

JTET परीक्षा
JTET परीक्षा
झारखंड में शिक्षक बनने का सपना देख रहे 5 लाख 65 हजार 916 अभ्यर्थियों ने आखिरकार अपना इम्तिहान दे दिया। दस साल...पूरे दस साल के लंबे इंतजार के बाद 1 नवंबर को राज्य के 24 जिलों में 986 परीक्षा केंद्रों पर JTET यानी झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा संपन्न हुई। परीक्षा केंद्रों पर भीड़ थी। किसी की आंखों में नौकरी का सपना था, किसी के मन में वर्षों की मेहनत का सवाल। कोई शिक्षक बनने की अपनी पहली सीढ़ी पार करने की उम्मीद लेकर परीक्षा में शामिल हुआ, तो कोई पहले से सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहा है और अब अपनी नौकरी की पात्रता बनाए रखने के लिए इस परीक्षा में बैठा है।

यह परीक्षा सिर्फ साढ़े पांच लाख अभ्यर्थियों की नहीं थी, यह झारखंड सरकार की भी परीक्षा थी। और अभ्यर्थियों ने तो अपना पेपर दे दिया। अब सरकार की बारी है।

सवाल है कि आखिर झारखंड में एक अनिवार्य शिक्षक पात्रता परीक्षा के आयोजन में दस साल क्यों लग गए? क्या यह सिर्फ प्रशासनिक सुस्ती थी, नीतिगत उलझन थी या फिर शिक्षा विभाग की जवाबदेही में कोई बड़ी चूक?

क्यों इस परीक्षा के लिए अभ्यर्थियों को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा? क्या सरकार और शिक्षा विभाग को युवाओं के भविष्य की चिंता तभी हुई, जब न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया?

JTET की पिछली परीक्षाओं के बाद शिक्षक नियुक्तियों में इतने विवाद क्यों हुए? स्थानीय नीति, जिलावार मेरिट लिस्ट, विषयों का संयोजन और आरक्षण की उलझनों ने हजारों पदों को कैसे प्रभावित किया?

इस बार की परीक्षा से पहले एडमिट कार्ड में विषय और दूसरी तकनीकी गड़बड़ियों की शिकायतें क्यों सामने आईं? क्या जैक इन समस्याओं का संतोषजनक समाधान कर पाया?

एक और बेहद अहम सवाल—इस परीक्षा में सिर्फ नए अभ्यर्थी ही नहीं, बल्कि पहले से सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षक भी शामिल हुए। आखिर उनके सामने TET पास करने की अनिवार्यता क्यों है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उनकी नौकरी और भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?


और इन सबसे बड़ा सवाल- क्या JTET पास करने के बाद झारखंड में शिक्षक नियुक्तियों का रास्ता खुलेगा? क्या सरकारी स्कूलों को पर्याप्त शिक्षक मिलेंगे? या फिर परीक्षा के बाद भी लाखों अभ्यर्थी रिजल्ट, विज्ञापन और नियुक्ति के इंतजार में फाइलों के चक्कर काटते रहेंगे?

क्योंकि एक बात साफ है- परीक्षा आयोजित कराना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन परीक्षा के बाद अभ्यर्थियों को उनका हक और समय पर नियुक्ति का अवसर देना भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।

आज की इस रिपोर्ट में सिर्फ JTET की परीक्षा की बात नहीं होगी। बात होगी इसके दस साल के इतिहास की, पुरानी नियुक्तियों के विवादों की, कार्यरत शिक्षकों की चिंता की और झारखंड की उस भर्ती व्यवस्था की, जिस पर लाखों लोगों का भविष्य टिका है। यहां सवाल सिर्फ परीक्षा आयोजित कराने का नहीं है। सवाल है सरकार की priority, education policy और accountability का। लेकिन इस परीक्षा की अहमियत समझने के लिए हमें आज के परीक्षा केंद्रों से थोड़ा पीछे जाना होगा। सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या इस बार JTET के बाद झारखंड में शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया भी आगे बढ़ेगी, या अभ्यर्थियों को एक नई तारीख और एक नए इंतजार के हवाले कर दिया जाएगा? यही इस पूरी कहानी का असली मुद्दा है। क्योंकि 5.65 लाख अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी है। अब सरकार को अपनी जवाबदेही का जवाब देना है।

परीक्षा का पुराना हिसाब...पात्रता मिली, नियुक्ति क्यों उलझी?


झारखंड में शिक्षक बनने की कहानी में एक अजीब विरोधाभास है। एक तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत बनी रहती है। दूसरी तरफ शिक्षक बनने की योग्यता रखने वाले अभ्यर्थी सालों तक नियुक्ति का इंतजार करते हैं। और जब नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होती है, तो कभी नियमों का विवाद सामने आता है, कभी मेरिट लिस्ट पर सवाल उठते हैं, तो कभी मामला अदालत तक पहुंच जाता है। यानी झारखंड में समस्या सिर्फ परीक्षा कराने की नहीं है। समस्या परीक्षा से नियुक्ति तक पहुंचने वाली पूरी व्यवस्था की है।

इस बात को समझने के लिए 2016 की शिक्षक पात्रता परीक्षा और उसके बाद की शिक्षक नियुक्तियों के दौर को देखना जरूरी है। सबसे पहले एक बात साफ कर लें..JTET पास करना और सरकारी शिक्षक के पद पर नियुक्त होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। JTET शिक्षक बनने की पात्रता से जुड़ी परीक्षा है। इसके बाद नियुक्ति के लिए अलग विज्ञापन, चयन प्रक्रिया और मेरिट लिस्ट होती है। लेकिन झारखंड में इन दोनों चरणों के बीच का रास्ता भी कई बार विवादों में घिरा रहा है।

2016 में झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ने स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्ति के लिए विज्ञापन संख्या 21/2016 जारी किया। इस भर्ती में करीब 17,972 पद विज्ञापित किए गए थे। लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होते ही विवाद खड़ा हो गया। विवाद था 13 अनुसूचित जिलों में स्थानीय अभ्यर्थियों के लिए शत-प्रतिशत आरक्षण का। राज्य सरकार के फैसले के आधार पर इन जिलों के शिक्षक पदों पर केवल संबंधित जिले के स्थानीय उम्मीदवारों को आवेदन करने की अनुमति दी गई थी। दूसरे जिलों के अभ्यर्थियों ने इसे चुनौती दी। मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा और 2020 में हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराते हुए नियुक्तियों को रद्द करने तथा नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

राज्य सरकार और प्रभावित अभ्यर्थी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। 2 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में बदलाव करते हुए पहले से की गई नियुक्तियों को पूरी तरह रद्द करने के बजाय राज्य को निर्देश दिया कि पूरे राज्य के लिए विषय और श्रेणी के आधार पर संशोधित मेरिट लिस्ट तैयार की जाए। अनुसूचित और गैर अनुसूचित क्षेत्रों के अभ्यर्थियों को उनकी व्यक्तिगत मेरिट के आधार पर समायोजित किया जाए।

अब जरा इस पूरे घटनाक्रम का मतलब समझिए। एक तरफ अभ्यर्थी परीक्षा देते हैं, मेहनत करते हैं, चयन प्रक्रिया में शामिल होते हैं। दूसरी तरफ नियुक्ति के नियमों पर विवाद होता है। फिर मामला अदालत में जाता है। फैसले आते हैं, मेरिट लिस्ट बदलती है और अभ्यर्थियों का इंतजार लंबा होता चला जाता है। और यह सिर्फ स्थानीय नीति का विवाद नहीं था। विषयों के संयोजन और शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी सवाल उठे। उदाहरण के लिए, इतिहास और नागरिक शास्त्र को एक साथ जोड़कर शिक्षक नियुक्ति की पात्रता तय करने पर अभ्यर्थियों ने आपत्ति की। उनका तर्क था कि दोनों अलग-अलग विषय हैं और इस व्यवस्था से कुछ योग्य उम्मीदवारों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। यह विवाद भी अदालत तक पहुंचा।  यानी भर्ती प्रक्रिया में नियमों की स्पष्टता कितनी जरूरी है, झारखंड इसका उदाहरण पहले भी देख चुका है।

और पुरानी नियुक्तियों का मामला आज भी पूरी तरह सवालों से मुक्त नहीं है। सितंबर 2025 में झारखंड हाईकोर्ट ने 2016 की स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश एसएन पाठक की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया। इस भर्ती में चयनित अभ्यर्थियों की मेरिट लिस्ट और कथित गड़बड़ियों को लेकर याचिकाएं दायर की गई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, विज्ञापित पदों में से 12,046 पर नियुक्तियां हुई थीं। वहीं कुछ आरक्षित श्रेणियों में योग्य अभ्यर्थी नहीं मिलने के कारण 3,704 पद सरेंडर किए गए और शेष 2,034 पदों को लेकर भी विवाद और कानूनी प्रक्रिया जारी थी।

अब सवाल उठता है—जब एक भर्ती प्रक्रिया को पूरा होने में इतने साल लग सकते हैं, तो JTET पास करने वाले नए अभ्यर्थियों को नियुक्ति के लिए कितना इंतजार करना पड़ेगा?

एक और महत्वपूर्ण पहलू है—पारा शिक्षक, जिन्हें अब सहायक अध्यापक कहा जाता है। लंबे समय से सरकारी स्कूलों में काम कर रहे इन शिक्षकों के लिए भी पात्रता और नियमित नियुक्ति का सवाल महत्वपूर्ण रहा है। पुरानी नियुक्ति प्रक्रियाओं में उनके लिए निर्धारित कोटे और उस कोटे में पर्याप्त योग्य अभ्यर्थी नहीं मिलने की समस्या भी सामने आती रही है। इसलिए JTET का यह आयोजन उनके लिए भी महत्त्व रखता है। नए अभ्यर्थी जहां शिक्षक बनने का रास्ता तलाश रहे हैं, वहीं कार्यरत शिक्षक अपनी पात्रता से जुड़ी शर्तें पूरी करने की कोशिश में हैं।

लेकिन सरकार के सामने असली चुनौती यह है कि परीक्षा, पात्रता, नियुक्ति और सेवा से जुड़े इन तमाम सवालों का एक स्पष्ट और भरोसेमंद समाधान कैसे निकले।

क्योंकि अभ्यर्थियों को सिर्फ विज्ञापन नहीं चाहिए। उन्हें ऐसी भर्ती प्रक्रिया चाहिए, जिसमें नियम पहले से स्पष्ट हों, मेरिट लिस्ट पारदर्शी हो और चयन के बाद नियुक्ति अदालतों में वर्षों तक न उलझे। झारखंड में शिक्षक बनने की राह सिर्फ लंबी नहीं रही है, कई बार उलझी हुई भी रही है। क्या इस बार सरकार उस पुराने चक्र को तोड़ पाएगी?

नौकरी कर रहे शिक्षकों पर TET की तलवार!


JTET की परीक्षा तो संपन्न हो गई, लेकिन परीक्षा से पहले अभ्यर्थियों की जो परेशानियां सामने आईं, वे इस पूरी व्यवस्था पर कई सवाल छोड़ गई हैं।एक तरफ दस साल बाद परीक्षा होने की खुशी थी, तो दूसरी तरफ एडमिट कार्ड हाथ में  आते ही कई अभ्यर्थियों की चिंता बढ़ गई। किसी के प्रवेश पत्र में विषय बदल गया, किसी की फोटो गायब थी, तो किसी के हस्ताक्षर नहीं थे।

अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि उन्होंने आवेदन में एक विषय चुना था, लेकिन एडमिट कार्ड में दूसरा विषय दर्ज कर दिया गया। मसलन, कुछ उम्मीदवारों ने भाषा शिक्षक का विकल्प चुना था, लेकिन प्रवेश पत्र में सामाजिक विज्ञान दर्ज होने की शिकायत की। कुछ ने इसका उलटा भी बताया।

26 अक्टूबर को अलग-अलग जिलों से अभ्यर्थी रांची स्थित जैक कार्यालय पहुंचे। उनका दावा था कि इन गड़बड़ियों से करीब 10 से 12 हजार उम्मीदवार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि यह संख्या अभ्यर्थियों का दावा थी, कोई अंतिम आधिकारिक आंकड़ा नहीं।

जैक की ओर से अभ्यर्थियों को परीक्षा में शामिल होने और बाद में त्रुटियों पर विचार करने का आश्वासन दिया गया था। अब परीक्षा हो चुकी है, इसलिए असली सवाल यह है कि क्या जैक इन शिकायतों का रिकॉर्ड लेकर उनका समाधान करेगा? क्या परिणाम और प्रमाणपत्र जारी होने से पहले विषय संबंधी गलतियों को दुरुस्त किया जाएगा? क्योंकि एडमिट कार्ड की एक तकनीकी गलती किसी अभ्यर्थी की भविष्य की नियुक्ति में बाधा बन जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

परीक्षा करा देना काफी नहीं है। परीक्षा से जुड़ी हर शिकायत का निष्पक्ष और पारदर्शी समाधान भी जरूरी है।

लेकिन JTET की इस बार की सबसे बड़ी और गंभीर चर्चा सिर्फ नए अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है। इस परीक्षा में तकरीबन 20 हजार ऐसे शिक्षक भी शामिल हुए, जो पहले से सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या उन शिक्षकों की है, जिनकी नियुक्ति शिक्षा का अधिकार कानून यानी RTE Act, 2009 लागू होने से पहले हुई थी। अब सवाल है कि वर्षों से सेवा दे रहे इन शिक्षकों को फिर TET पास करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

दरअसल, 1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि RTE Act के दायरे में आने वाले स्कूलों में शिक्षक के रूप में बने रहने के लिए भी निर्धारित श्रेणी के सेवारत शिक्षकों को TET पास करना होगा। यानी यह शर्त केवल नई नियुक्तियों तक सीमित नहीं है। इस फैसले का झारखंड के शिक्षकों पर क्या असर होगा, इसे समझना जरूरी है।

राज्य में ऐसे हजारों शिक्षक हैं, जो लंबे समय से प्राथमिक स्कूलों में सेवा दे रहे हैं। उनके लिए JTET अब सिर्फ एक पात्रता परीक्षा नहीं, बल्कि उनकी सेवा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण शर्त बन गई है।

जरा सोचिए! जिस शिक्षक ने वर्षों तक बच्चों को पढ़ाया, स्कूल की जिम्मेदारी संभाली और अपनी सेवा दी, उसे अब यह साबित करना है कि वह निर्धारित TET पात्रता भी पूरी करता है। यहां एक तरफ बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए योग्य शिक्षकों की जरूरत है, तो दूसरी तरफ वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के सामने नौकरी की निरंतरता और भविष्य की चिंता है। सरकार और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है कि वे इस स्थिति को स्पष्ट करें। कितने शिक्षक इस फैसले के दायरे में आएंगे? उनके लिए आगे कितने अवसर उपलब्ध होंगे? और क्या झारखंड में नियमित JTET आयोजित करने की कोई ठोस समय-सारिणी बनेगी?

JTET के बाद क्या? नियुक्ति का इंतजार या फिर एक और परीक्षा?


अब सबसे बड़ा सवाल—JTET की परीक्षा तो संपन्न हो गई, लेकिन इसके बाद क्या? क्या झारखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षक नियुक्ति का रास्ता खुलेगा? क्या राज्य सरकार पहले से खाली पड़े पदों को भरने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी? या फिर अभ्यर्थियों को एक बार फिर रिजल्ट, प्रमाणपत्र, विज्ञापन और नियुक्ति की तारीखों का इंतजार करना पड़ेगा?

झारखंड में शिक्षकों की कमी कोई नई बात नहीं है। राज्य के कई सरकारी स्कूल आज भी पर्याप्त शिक्षकों के बिना चल रहे हैं। कहीं एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है, तो कहीं विषयवार शिक्षकों की कमी से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है।

सरकार ने सहायक आचार्य के 26,001 पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की थी। लेकिन अगस्त 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 9,348 अभ्यर्थियों का चयन हुआ था, जबकि 16,653 पद खाली रह गए थे। यानी शिक्षक नियुक्ति की जरूरत और उपलब्ध शिक्षकों के बीच का अंतर अब भी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में JTET पास करने वाले अभ्यर्थियों के सामने भी सवाल है कि पात्रता प्रमाणपत्र मिलने के बाद अगला कदम क्या होगा? सरकार कब नई नियुक्ति का विज्ञापन निकालेगी? कितने पदों पर भर्ती होगी? और क्या नियुक्ति प्रक्रिया तय समय-सीमा के भीतर पूरी की जाएगी?

यहां एक बात साफ होनी चाहिए—JTET पास करना नौकरी की गारंटी नहीं है। यह शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया में शामिल होने की पात्रता है। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ परीक्षा लेकर प्रमाणपत्र बांटने तक खत्म नहीं हो जाती। उसे यह भी बताना होगा कि राज्य में शिक्षकों के खाली पद कब और कैसे भरे जाएंगे। दस साल बाद JTET का आयोजन हुआ है। इस दौरान एक पूरी पीढ़ी इंतजार करती रही। कई अभ्यर्थियों की उम्र बढ़ गई, कई की उम्मीदें कमजोर पड़ गईं। और अब परीक्षा के बाद उनकी निगाहें सरकार के अगले फैसले पर टिकी हैं।

इसलिए झारखंड सरकार को तीन मोर्चों पर जवाब देना होगा—पहला, JTET का परिणाम और प्रमाणपत्र बिना अनावश्यक देरी के जारी हों। दूसरा, एडमिट कार्ड और परीक्षा से जुड़ी शिकायतों का निष्पक्ष समाधान हो। और तीसरा, शिक्षक नियुक्ति का स्पष्ट रोडमैप सामने आए। साथ ही, भविष्य में JTET नियमित अंतराल पर आयोजित करने की व्यवस्था भी बने।

क्योंकि पांच लाख 65 हजार अभ्यर्थियों ने सिर्फ एक परीक्षा नहीं दी है। उन्होंने अपने भविष्य के साथ-साथ झारखंड की शिक्षा व्यवस्था से भी उम्मीद जोड़ी है। और आखिर में सरकार से एक सीधा सवाल—अगर राज्य को शिक्षकों की जरूरत है, स्कूलों में पद खाली हैं और लाखों युवा शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे हैं, तो फिर नियुक्ति में देरी क्यों?  याद रखिए, परीक्षा कराना सरकार की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन समय पर नियुक्ति देना उसकी जवाबदेही है।
 
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